राज्यसभा का सभापति किसे अपना त्यागपत्र देता है?

राज्यसभा का सभापति किसे अपना त्यागपत्र देता है?

दोस्तों, आज के समय एक सवाल काफी चर्चा में है कि rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kisko deta hai. लेकिन इस सवाल के जवाब को जानने से पहले, आपका यह जानना आवश्यक है कि राज्यसभा का सभापति कौन होता है, और उसके कार्य क्या होते हैं। इसके पश्चात ही आप समझ पाएंगे कि राज्यसभा का सभापति अपना त्यागपत्र किसको देता है। यदि आप यह जानना चाहते हैं कि rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kisko deta hai तो आज के लेख में हम आपको यह विस्तार से बताएंगे कि rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kise deta hai. तो चलिए शुरू करते हैं और राज्यसभा के सभापति के बारे में विस्तार से जानते हैं:-

राज्यसभा का सभापति किसे अपना त्यागपत्र देता है? | Rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kisko deta hai

जैसा कि हमने आपको बताया कि राज्यसभा का सभापति किसी भी प्रकार से सभापति के पद से त्यागपत्र नहीं दे सकता और ना ही कोई शक्ति उन्हें सभापति के पद से हटा सकती है। यदि राज्यसभा के सभापति को उनके पद से हटाना है तो उन्हें उपराष्ट्रपति के पद से हटाना होगा। एक उच्च कार्यकारी शक्ति के तौर पर उपराष्ट्रपति को यदि अपना त्यागपत्र देना होता है, तो वह अपने उच्च अधिकारी को अपना अपना त्यागपत्र देता है। यानी कि राज्यसभा का सभापति अपना त्यागपत्र राज्यसभा के सभापति को देता है।

राष्ट्रपति चाहे तो उपराष्ट्रपति को उसके पद से निष्कासित करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है, और एक बार व्यक्ति उपराष्ट्रपति के पद से हट जाए तो वह राजकीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के द्वारा राज्यसभा के सभापति के पद से तुरंत ही निष्कासित कर दिया जाता है।

भारतीय राज्य सभा की विशेषता

Rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kisko deta hai

भारत की राज्य सभा लोकतंत्र का दूसरा मंदिर कहलाती है, और इसका पहला मंदिर लोकसभा कहलाती है। लोकतंत्र के तीन स्तंभ जिनके नाम लोकसभा राज्यसभा और राष्ट्रपति होता है, उन्हें राज्यसभा का महत्व लोकसभा के जितना ही होता है, और इसे Upper House के नाम से जाना जाता है।

एक प्रकार से भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा, भारत की “Bicameral Parliament System” का द्योतक है। राज्यसभा में कुल 245 सांसद जिन्हें सदस्य भी कहा जा सकता है, बैठ सकते हैं। जिनमें 233 राज्यों की विधानसभाओं से तथा केंद्र शासित प्रदेशों से भेजे जाते हैं, और 12 सदस्य राष्ट्रपति के द्वारा आयोजित किए जाते हैं। यह सारी जानकारी भारत के संविधान के अनुच्छेद 80 में विस्तार से बताया है।

किसी भी राज्यसभा के सांसद का अधिकतम कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, और हर 2 वर्ष में राज्यसभा के लगभग 33% सांसद अपना इस्तीफा दे देते हैं। इस पूरे राज्य सभा की प्रधानता सभापति के हाथ में होती है। आपको बता दिया जाए कि जिस प्रकार लोकसभा का पीठासीन अधिकारी या पीठासीन अधिपति अध्यक्ष कहलाता है। उसी प्रकार राज्यसभा का पीठासीन अधिपति सभापति कहलाता है।

राज्यसभा का विघटन

राज्यसभा के बारे में एक बात और कही जाती है कि यह लोकसभा की तरह कभी भी विघटित नहीं हो सकती है, और यह अपने निरंतर चलते कार्यकाल की वजह से कभी भी बंद नहीं हो सकती। कुछ मामलों में जैसे कि वित्त संबंधी मामलों में लोकसभा को राज्यसभा से अधिक शक्तियां प्राप्त हैं, अन्यथा राज्यसभा लोकसभा के द्वारा प्रस्तावित किए गए किसी भी कानून को रोकने की क्षमता रखता है।

कुछ मामलों में भारत की लोकसभा और राज्यसभा की ज्वाइन सेटिंग की बैठाई जाती है जिसमें अध्यक्ष का पद लोकसभा के अध्यक्ष के लिए होता है, तथा उपाध्यक्ष का पद पीठासीन अधिपति सभापति के लिए होता है। राज्यसभा का सभापति भारत के उपराष्ट्रपति के नाम से भी जाना जाता है, और इसके कार्यों की सूची हमने आपको नीचे विस्तार से बताई है-

राज्यसभा के सभापति के कार्य

राज्यसभा के सभापति के विभिन्न प्रकार के कार्य नीचे निर्दिष्ट किए गए हैं-

  1. राज्यसभा का सभापति उप राष्ट्रपति के तौर पर सभा की सभी बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  2. सभा की गरिमा और प्रतिष्ठा का संरक्षण केवल और केवल सभापति होता है।
  3. इसी के साथ राज्यसभा का सभापति राज्यसभा का प्रमुख प्रवक्ता भी होता है।
  4. वह राज्यसभा में अंदर में बाहर की दुनिया के लिए सामूहिक भावना का प्रतिनिधित्व करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि राज्यसभा की कार्यवाही संगत उपबंधों तथा परिपाटियों व प्रथाओं के अनुसार ही संचालित की जाए।
  5. सभा में पूर्ण शिष्टाचार बनाया जा सके, इसके लिए सभापति उत्तरदायी होते है।
  6. इसी के साथ राज्यसभा के सभी सदस्यों के अधिकारों तथा विशेष अधिकारों का अभि रक्षक और संरक्षक केवल सभापति होता है।
  7. जब भारत सरकार की जवाबदेही जनता के प्रति सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। तब राज्य सभा का सभापति अपनी कुशलता दिखाते हुए स्थिति को संभालते हुए यह सुनिश्चित करता है कि सभी प्रश्नों और विधेयकों की ऐतिहासिक चर्चा की जाए।
  8. एक पीठासीन अधिकारी के रूप में सभापति के पास निर्णायक मत देने की क्षमता और शक्ति भी होती है।
  9. जब राज्यसभा में लोकसभा के द्वारा प्रस्तावित कोई ऐसा ऐसा विधेयक आता है जो संविधान संशोधन से जुड़ा है यह संविधान संशोधन पर आधारित है, तो इस पर वह अनिवार्य रूप से अपनी भूमिका निभाता है।
  10. राज्यसभा का पीठासीन अधिकारी अपने किसी भी निर्णय का कारण बताने के लिए बाध्य नहीं होता है।
  11. सभाती जी के किसी भी कार्य के लिए सभापति की आलोचना नहीं की जा सकती है।
  12. यदि सभापति को जबरदस्ती उसके पद से हटाना है तो उन्हें उपराष्ट्रपति के पद से ही हटाया जाएगा, अन्य कोई भी शक्ति सभापति को राज्यसभा के सभापति के पद से निष्कासित नहीं कर सकती है।
  13. अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हें उपराष्ट्रपति के पद से हटाना आवश्यक होगा।
  14. अपने कई कार्यों में उपसभापति का सहयोग भी प्राप्त करता है, जो सभा के सदस्यों के द्वारा ही चुना जाता है।
  15. यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद खाली है, तो उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के कार्य भी करता है, उपराष्ट्रपति के कार्य करता है, और राज्यसभा के सभापति का कार्य करता है।

निष्कर्ष

आज के लेख में हमने जाना कि rajya sabha ka sabhapati apna tyagpatra kisko deta hai? इसके अलावा हमने आपको राज्यसभा के बारे में विस्तार से जानकारी दी है, और राज्यसभा के सभापति के कार्यों और शक्तियों के बारे में आपको विस्तार से बताया है। हम आशा करते हैं कि आज के इस लेख में आप अच्छे से जानकारी प्राप्त कर पायें होंगे। यदि आपके मन में कोई सवाल है। तो आप कमेंट बॉक्स में कमेंट कर सकते हैं।

FAQ

राज्यसभा में सभापति की नियुक्ति कौन करता है?

यह भारत के उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों की अध्यक्षता करता है।

राज्यसभा के सभापति के रूप में कौन होता है?

भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का सभापति होता है। राज्य सभा के उपसभापति का चुनाव आंतरिक रूप से राज्य सभा द्वारा किया जाता है।

सभापति को कितना वेतन मिलता है?

इसका मूल वेतन 50,000 रुपये है। इसके अलावा व्यय भत्ता 3000 रुपये और सांसद भत्ता 45,000 रुपये है।